001: “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत”

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ।।
(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र १४) [Kathhopnishad, 1.3.14]

उठो, जागो, और जानकार श्रेष्ठ पुरुषों के सान्निध्य में ज्ञान प्राप्त करो । उठो जागो एवं सत्य को पहचानो.

Arise! wake up & learn the truth or gain the knowledge.


Arise! O human beings in the quagmire of Samsara! Turn towards the acquisition of spiritual knowledge of the Atman, the Supreme Self, give up thinking of worldly objects.
Jaagrata- Awake from the slumber of ignorance. destroy the sleep of ignorance,
varaan- the excellent (teacher). …

~ Ctsy: The Principal Upanishads by Sw. Sivananda *

– भावार्थ –

ऋषि कहता है — हे प्रमाद व आलस्य की निद्रा सोनेवालो ! तुम्हारी यह निद्रा तुम्हारे लिये भयावह है , इससे सजग होकर , सावधान होकर उठो ।‌ खोज करके ब्रह्मवेत्ता गुरु के पास जाओ । जब तक ब्रह्मज्ञानी गुरु न मिले , तुम‌ अपने तत्त्व , स्वरुप को नहीं जान सकते । जिसको अपने स्वरुप का ज्ञान न हो वह अपने हानि लाभ को नहीं समझ सकता । जिसको अपने हानि लाभ का ज्ञान न हो , वह कैसे दुःखों से छूटकर आनन्द प्राप्त कर सकता है । यह मार्ग सान पर चढ़ाकर तीक्ष्ण किये हुए छुरे की धार से भी तीक्ष्ण है , जिस पर चलने वालों‌ को पग-पग पर गिरने का भय रहता है । ब्रह्मज्ञानी लोग बतलाते हैं कि इस मार्ग पर चलना अत्यन्त कठिन है ।

~ स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती

– विमर्श –

प्रश्न – किसी गुरु के पास जाने की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर – यह मार्ग प्रत्यक्ष तो है नहीं , जिसको इन्द्रियों से जान सकें । जब सांसारिक मार्ग भी बतलाने वाले के बिना , ज्ञान नहीं हो सकता , तब इस सूक्ष्म मार्ग के लिये क्या किसी बतलाने वाले की आवश्यकता नहीं है ?

प्रश्न – किसी मूर्ख को मार्ग प्रदर्शक की आवश्यकता हो सकती है । हमने पदार्थ विद्या ( science ) भूगोल , इतिहास आदि विद्यायें पढ़ी हैं , हमें गुरु की क्या आवश्यकता है ?
उत्तर – निस्सन्देह जो विद्यायें आप पढ़ चुके हैं , उनके लिये आपको किसी गुरु की आवश्यकता नहीं है , किन्तु जैसे आपने यह विद्यायें गुरु से पढ़ी हैं , गुरु के बिना नहीं आईं वैसे ही ब्रह्मविद्या के लिये भी जब तक ब्रह्मज्ञा‌नी गुरु न मिले , आप उसके निपुण ज्ञाता नहीं हो सकते ।

प्रश्न – यदि यह मार्ग इतना विकट है और छुरे की धारा से भी अधिक तीक्ष्ण है तो हमें क्या आवश्यकता पड़ी है कि हम इस पर चलें ?
उत्तर – चाहे आप नित्य दुःख उठाया करें , जैसे मजदूर प्रतिदिन अन्न कमाता है और प्रतिदिन समाप्त कर देता है अथवा किसान की भांति अधिक परिश्रम करके खेती करें और पर्याप्त समय के लिये निश्चिन्त हो जायें । इसी भांति कष्टसाध्य मार्ग पर चलकर आप या तो इकतीस नील , दस खरब , चालीस वर्षों तक पूर्ण आनन्द भोगें या इस मार्ग से हटकर कीट पतंग से भी नीच गति प्राप्त करें ।

प्रश्न – हम तो चाहते हैं कि इतने बड़े सुख को प्राप्त करें किन्तु यह तो बहुत दुर्लभ है ।
उत्तर – निस्सन्देह दुर्लभ है किन्तु अलभ्य या असम्भव नहीं । कठिन कार्य से अज्ञानी डरा करते हैं या दुर्बल या भीरु । यदि तुम नचिकेता जैसे कुमार से शिक्षा लेकर , कामना – त्यागरूपी कठोर व्रत को धारण करो , तो सफलता सामने है ।

~ स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती

 

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